हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
पुमा॑न्पुं॒सः परि॑जातोऽश्व॒त्थः ख॑दि॒रादधि॑ । स ह॑न्तु॒ शत्रू॑न्माम॒कान्यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥ (१)
अत्यंत शक्ति संपन्न वृक्ष पीपल से तथा गायत्री के सार से उत्पन्न सहयोग से निर्मित अश्वत्थ मणि धारण करने पर मेरे उन शत्रुओं का विनाश करें, जिन से मैं द्वेष करता हूं और जो मुझ से द्वेष करते हैं. (१)
When I wear ashwattha mani made from the very powerful tree Peepal and with the support generated from the essence of Gayatri, destroy my enemies whom I hate and who hate me. (1)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
तान॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्वैबाध॒दोध॑तः । इन्द्रे॑ण वृत्र॒घ्ना मे॒दी मि॒त्रेण॒ वरु॑णेन च ॥ (२)
हे खदिर वृक्ष में उत्पन्न पीपल से निर्मित अश्वत्थमणि! तू मेरे शत्रुओं का पूर्ण रूप से नाश कर दे. वृत्र का नाश करने वाले इंद्र और वरुण के साथ तेरी मित्रता है. (२)
O Ashwatthamani made from peepal produced in the Khadir tree! You destroy my enemies completely. You have a friendship with Indra and Varuna, who destroyed Vritra. (2)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
यथा॑श्वत्थ नि॒रभ॑नो॒ऽन्तर्म॑ह॒त्य॑र्ण॒वे । ए॒वा तान्त्सर्वा॒न्निर्भ॑ङ्ग्धि॒ यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥ (३)
हे मणि के उपादानकारण अश्वत्थ! तुम जिस प्रकार, खदिर वृक्ष के कोटर को भेद कर उत्पन्न हुए हो, उसी प्रकार मेरे सभी शत्रुओं का विनाश कर दो. (३)
O Gem's upadankaran ashwata! Just as you were born by penetrating the coat of the khadir tree, so destroy all my enemies. (3)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
यः सह॑मान॒श्चर॑सि सासहा॒न इ॑व ऋष॒भः । तेना॑श्वत्थ॒ त्वया॑ व॒यं स॒पत्ना॑न्त्सहिषीमहि ॥ (४)
पीपल उसी प्रकार दूसरे वृक्षों को पराजित करता हुआ बढ़ता है, जिस प्रकार बैल अपने दर्प से अन्य पशुओं को पराजित करता है. हे पीपल! तुम से निर्मित मणि को धारण करने वाले हम शत्रुओं का नाश करें. (४)
Peepal grows by defeating other trees in the same way that bull defeats other animals with its help. O people! Let us destroy the enemies who wear the gem made of you. (4)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
सि॒नात्वे॑ना॒न्निरृ॑तिर्मृ॒त्योः पाशै॑रमो॒क्यैः । अश्व॑त्थ॒ शत्रू॑न्माम॒कान्यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥ (५)
हे अश्वत्थ! पाप की देवी मृत्यु के न छूटने वाले फंदों से मेरे उन शत्रुओं को बांधो, जिन से मैं द्वेष करता हूं और जो मुझ से द्वेष करते हैं. (५)
O Ashwattha! Bind my enemies with the unforeseen noose of death, the goddess of sin, whom I hate and who hate me. (5)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
यथा॑श्वत्थ वानस्प॒त्याना॒रोह॑न्कृणु॒षेऽध॑रान् । ए॒वा मे॒ शत्रो॑र्मू॒र्धानं॒ विष्व॑ग्भिन्द्धि॒ सह॑स्व च ॥ (६)
हे अश्वत्थ! जिस प्रकार तुम सभी वनस्पतियों अर्थात्‌ वृक्षों को नीचे छोड़ते हुए ऊपर उठते हो, उसी प्रकार मेरे शत्रुओं के शीशों को सभी और से कुचलो और उन का विनाश कर दो. (६)
O Ashwattha! Just as you rise up leaving down all the vegetation, that is, the trees, so crush the glasses of my enemies from all sides and destroy them. (6)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
तेऽध॒राञ्चः॒ प्र प्ल॑वन्तां छि॒न्ना नौरि॑व॒ बन्ध॑नात् । न वै॑बा॒धप्र॑णुत्तानां॒ पुन॑रस्ति नि॒वर्त॑नम् ॥ (७)
तट के वृक्षों से रस्सी के सहारे बंधी हुई नाव खुलने के बाद जिस प्रकार किनारे को प्राप्त न कर के नदी की धारा के साथ नीचे की ओर बहती जाती है, उसी प्रकार मेरे शत्रु नीचे को मुंह कर के नदी के प्रवाह में बहें, क्योंकि खदिर के वृक्ष में उत्पन्न पीपल के प्रभाव में आए हुए शत्रुओं का उद्धार नहीं होता. (७)
After opening the boat tied to the trees of the coast with the help of rope, just as it flows down along the stream of the river instead of getting the shore, in the same way, my enemies should face down and flow in the flow of the river, because the enemies under the influence of peepal produced in the khadir tree are not saved. (7)

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
प्रैणा॑न्नुदे॒ मन॑सा॒ प्र चि॒त्तेनो॒त ब्रह्म॑णा । प्रैणा॑न्वृ॒क्षस्य॒ शाख॑याश्व॒त्थस्य॑ नुदामहे ॥ (८)
मैं दृढ़ मानसिक शक्ति और गंध के प्रभाव द्वारा अपने शत्रुओं का उच्चाटन करता हूं. मैं मंत्रों से प्रभावित पीपल वृक्ष की शाखा के द्वारा शत्रुओं का विनाश करता हूं. (८)
I exalt my enemies through strong mental strength and influence of smell. I destroy enemies through the branch of peepal tree affected by mantras. (8)