हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
रोह॑ण्यसि॒ रोह॑ण्य॒स्थ्नश्छि॒न्नस्य॒ रोह॑णी । रो॒हये॒दम॑रुन्धति ॥ (१)
हे लाल रंग वाली लाख! तू घाव को भरने वाली है, इसलिए तू तलवार की धार से कटे हुए इस अंग से बहते रक्त को उसी स्थान पर रोक दे. हे अरुंधती देवी! तू इस रक्त निकले हुए अंग को रक्त युक्त एवं बिना घाव वाला बना. (१)
O red-colored lac! You are going to heal the wound, so stop the blood flowing from this organ cut off by the edge of the sword in the same place. O Arundhati Devi! You made this blood-drained organ blood-stained and unsound. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
यत्ते॑ रि॒ष्टं यत्ते॑ द्यु॒त्तमस्ति॒ पेष्ट्रं॑ त आ॒त्मनि॑ । धा॒ता तद्भ॒द्रया॒ पुनः॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥ (२)
हे शस्त्र से घायल पुरुष! तेरा जो अंग घायल और शस्त्र प्रहार की वेदना से जल रहा है तथा तेरा जो अंग मुगदर आदि के प्रहार से भग्न हो गया है, विधाता तेरे उन अंगों को लाख के द्वारा जोड़ दे. (२)
O man wounded by arms! Your part which is injured and burning with the pain of arms attack and your part which has been broken by the attack of Mugdar etc., the creator should connect those parts of yours with lac. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
सं ते॑ म॒ज्जा म॒ज्ज्ञा भ॑वतु॒ समु॑ ते॒ परु॑षा॒ परुः॑ । सं ते॑ मां॒सस्य॒ विस्र॑स्तं॒ समस्थ्यपि॑ रोहतु ॥ (३)
हे घायल पुरुष! तेरे शरीर की जो चरबी चोट से विभक्त हो गई है, वह जुड़ जाए और तू सुख का अनुभव करे. तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी भी जुड़ जाए. प्रहार के घाव से कटा हुआ मांस सुखपूर्वक उत्पन्न हो जाए तथा तेरे शरीर की टूटी हुई हड्डी सुख से जुड़ जाए. (३)
O wounded man! Let the fat of your body, which has been divided by injury, be connected and you experience happiness. The broken bone of your body should also be added. May the cut flesh from the wound of the blow be produced happily and the broken bone of your body will be connected to happiness. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
म॒ज्जा म॒ज्ज्ञा सं धी॑यतां॒ चर्म॑णा॒ चर्म॑ रोहतु । असृ॑क्ते॒ अस्थि॑ रोहतु मां॒सं मां॒सेन॑ रोहतु ॥ (४)
तेरी चरबी से चरबी मिल जाए. चमड़ा चमड़े से मिल जाए और तेरे शरीर से टपकता हुआ रक्त मंत्र और ओषधि के प्रभाव से पुनः हड्डी को प्राप्त हो. तेरा मांस मांस से मिल जाए. (४)
Get fat from your fat. May the leather meet the leather and the blood dripping from your body is restored to the bone with the effect of mantras and medicines. Let your meat meet the meat. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
लोम॒ लोम्ना॒ सं क॑ल्पया त्व॒चा सं क॑ल्पया॒ त्वच॑म् । असृ॑क्ते॒ अस्थि॑ रोहतु छि॒न्नं सं धे॑ह्योषधे ॥ (५)
हे लाख नाम की ओषधि! तू प्रहार के कारण शरीर से पृथकू त्वचा को त्वचा से मिला दे. हे घायल पुरुष! तेरी हड्डियों पर रक्त दौड़ने लगे. हे ओषधि! शरीर का जो भी कटा हुआ भाग है, उसे जोड़ कर दैनिक गतिविधियों में सक्षम बना. (५)
O medicine named Lakh! You should mix the skin separated from the body to the skin due to the blow. O wounded man! Blood started running on your bones. O medicine! Whatever is the cut part of the body, it was able to do daily activities by adding it. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
स उत्ति॑ष्ठ॒ प्रेहि॒ प्र द्र॑व॒ रथः॑ सुच॒क्रः सु॑प॒विः सु॒नाभिः॒ । प्रति॑ तिष्ठो॒र्ध्वः ॥ (६)
हे शस्त्र के प्रहार से घायल पुरुष! मंत्र और ओषधि की शक्ति से तेरा घायल अंग स्वस्थ हो गया है. तू चारपाई से उठ कर उसी प्रकार तेजी से दौड़, जिस प्रकार रथ उत्तम पहियों और दृढ़ धुरों से युक्त हो कर तेजी से चलता है. (६)
O man injured by the blow of the weapon! With the power of mantra and medicine, your injured limb has become healthy. You get up from the cot and run as fast as the chariot with good wheels and strong axles. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
यदि॑ क॒र्तं प॑ति॒त्वा सं॑श॒श्रे यदि॒ वाश्मा॒ प्रहृ॑तो ज॒घान॑ । ऋ॒भू रथ॑स्ये॒वाङ्गा॑नि॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥ (७)
हे पुरुष! यदि काटने वाला आयुध तेरे शरीर पर गिर कर उस को काट रहा है अथवा दूसरों के द्वारा फेंका हुआ पत्थर तुझे चोट पहुंचा रहा है, तेरे शरीर के उन अंगों को मंत्र और ओषधि का प्रभाव उसी प्रकार स्वस्थ बनाए, जिस प्रकार बढ़ई रथ के भिन्न अंगों को जोड़ कर एक कर देता है. (७)
O man! If the cutting armament falls on your body and cuts it or the stone thrown by others is hurting you, make those parts of your body healthy in the same way as the carpenter unites the different parts of the chariot. (7)