हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.15.3

कांड 4 → सूक्त 15 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 15
समी॑क्षयस्व॒ गाय॑तो॒ नभां॑स्य॒पां वेगा॑सः॒ पृथ॒गुद्वि॑जन्ताम् । व॒र्षस्य॒ सर्गा॑ महयन्तु॒ भूमिं॒ पृथ॑ग्जायन्तां वी॒रुधो॑ वि॒श्वरू॑पाः ॥ (३)
हे मरुद्गण! तुम स्तुति करते हुए हम लोगों को मेघों के दर्शन कराओ. वेग युक्त जल धाराएं इधरउधर बहे. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (३)
O Desertion! Praise us and make us see the clouds. Velocity water currents flow here and there. Streams of rain water worship the earth. Different types of crops like barley, wheat etc. should be produced separately from rain-fed land. (3)