हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
बृ॒हन्नेषामधिष्ठा॒ता अ॑न्ति॒कादि॑व पश्यति । यस्ता॒यन्मन्य॑ते॒ चर॒न्त्सर्वं॑ दे॒वा इ॒दं वि॑दुः ॥ (१)
महान वरुण इन शत्रुओं का नियंत्रण करते हुए इन के सभी अन्यायी जनों को समीप से देखते हैं. वरुण जगत्‌ की स्थावर एवं जंगम सभी वस्तुओं को जानते हैं. अतींद्रिय ज्ञान के कारण देवगण स्थिर और नश्वर सभी तत्त्वों को जानते हैं. (१)
The great Varuna controls these enemies and watches all their unjust people closely. Varuna knows all the immovable and movable things of the world. Due to transcendental knowledge, devas know all the elements stable and mortal. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
यस्तिष्ठ॑ति॒ चर॑ति॒ यश्च॑ वञ्चति॒ यो नि॒लायं॒ चर॑ति॒ यः प्र॒तङ्क॑म् । द्वौ सं॑नि॒षद्य॒ यन्म॒न्त्रये॑ते॒ राजा॒ तद्वे॑द॒ वरु॑णस्तृ॒तीयः॑ ॥ (२)
जो शत्रु सामने खड़ा होता है, जो चलता है, जो कुटिलतापूर्वक ठगता है, जो छिप कर प्रतिकूल आचरण करता है तथा जो शत्रु कष्टमय जीवन पा कर विरोध करता है, महान वरुण इन सभी शत्रुओं को समय से देखते हैं. दो व्यक्ति एकांत में बैठ कर जो गुप्त मंत्रणा करते हैं, उसे राजा वरुण तीसरे के रूप में जानते हैं. (२)
The enemy who stands in front, who walks, who cheats crookedly, who behaves in secret and who opposes the enemy after getting a painful life, the great Varuna sees all these enemies from time to time. King Varuna knows the secret advice that two people sit in solitude and do as the third. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
उ॒तेयं भूमि॒र्वरु॑णस्य॒ राज्ञ॑ उ॒तासौ द्यौर्बृ॑ह॒ती दूरेअन्ता । उ॒तो स॑मु॒द्रौ वरु॑णस्य कु॒क्षी उ॒तास्मिन्नल्प॑ उद॒के निली॑नः ॥ (३)
यह भूमि भी दुष्टों का निग्रह करने वाले स्वामी वरुण के वश में रहती है. समीप और दूर तक फैली हुई धरती भी उन्हीं के अधिकार में है. पूर्व और पश्चिम में वर्तमान सागर वरुण की कोख में है. इस प्रकार स्वल्प जल में भी सारा जगत्‌ छिपा हुआ है. (३)
This land also remains under the control of Swami Varuna, who controls the wicked. The land that is near and far is also under their control. The present ocean in the east and west is in the womb of Varuna. In this way, the whole world is hidden in self-water. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
उ॒त यो द्याम॑ति॒सर्पा॑त्प॒रस्ता॒न्न स मु॑च्यातै॒ वरु॑णस्य॒ राज्ञः॑ । दि॒व स्पशः॒ प्र च॑रन्ती॒दम॑स्य सहस्रा॒क्षा अति॑ पश्यन्ति॒ भूमि॑म् ॥ (४)
जो अनर्थकारी शत्रु पुण्य कमो से प्राप्त होने वाले स्वर्ग का अतिक्रमण कर के कुमार्ग पर चलता है, वह राजा वरुण के पाशों से न छूटे. स्वर्गलोक से निकलने वाले वरुण के गुप्तचर पृथ्वी पर घूमते हैं. वे हजार आंखों वाले होने के कारण भूलोक के सारे वृत्तांत को देखते हैं. (४)
The evil enemy who encroaches on heaven obtained from virtue and walks on the wrong path, he should not be left out of the traps of King Varuna. Varuna's detectives emanating from heaven roam the earth. They see all the accounts of The Land, being a thousand-eyed. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
सर्वं॒ तद्राजा॒ वरु॑णो॒ वि च॑ष्टे॒ यद॑न्त॒रा रोद॑सी॒ यत्प॒रस्ता॑त् । संख्या॑ता अस्य नि॒मिषो॒ जना॑नाम॒क्षानि॑व श्व॒घ्नी नि मि॑नोति॒ तानि॑ ॥ (५)
धरती और आकाश के मध्य में तथा राजा वरुण के सामने जो प्राणी रहते हैं, उन्हें वे विशेष रूप से देखते हैं. उन के भलेबुरे कर्मों की गणना करने वाले वरुण उन के कर्मो के अनुसार ऐसा दंड निश्चित करते हैं, जिस प्रकार जुआरी अपनी विजय के लिए पासे फेंकता है. (५)
They especially see the creatures who live between the earth and the sky and in front of King Varuna. Varuna, who calculates their good deeds, decides such a punishment according to their deeds, just as the gambler throws dice for his victory. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
ये ते॒ पाशा॑ वरुण स॒प्तस॑प्त त्रे॒धा तिष्ठ॑न्ति॒ विषि॑ता॒ रुष॑न्तः । छि॒नन्तु॒ सर्वे॒ अनृ॑तं॒ वद॑न्तं॒ यः स॑त्यवा॒द्यति॒ तं सृ॑जन्तु ॥ (६)
हे वरुण! तुम्हारे उत्तम, मध्यम एवं अधम श्रेणी के सातसात पापियों के निग्रह के निमित्त जहांतहां बंधे हुए हैं. वे पाश पापियों की हिंसा करते हुए स्थित हैं, वे पाश असत्य भाषण करने वाले हमारे शत्रु को काट दें और जो सत्यवादी है, उसे छोड़ दें. (६)
O Varuna! Seventy-seven of your best, middle and lower classes are bound everywhere for the control of sinners. They are located in violence against sinners, they should cut off our enemy who makes false speeches and leave the one who is truthful. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
श॒तेन॒ पाशै॑र॒भि धे॑हि वरुणैनं॒ मा ते॑ मोच्यनृत॒वाङ्नृ॑चक्षः । आस्तां॑ जा॒ल्म उ॒दरं॑ श्रंसयि॒त्वा कोश॑ इवाब॒न्धः प॑रिकृ॒त्यमा॑नः ॥ (७)
हे वरुण! अपने सौ पाशों से इस असत्यवादी को बांधो. हे मनुष्यों के भलेबुरे कर्मो को देखने वाले! असत्य बोलने वाला तुम से छूटने न पाए. बिना विचारे काम करने वाला अपने उदर को जलोदर रोग से दूषित पा कर तलवार की म्यान के समान झूलता रहे. (७)
O Varuna! Bind this untruthful with your hundred loops. O one who sees the good deeds of men! The one who speaks untruth should not be spared from you. Those who work without thinking, find their abdomen contaminated with ascites disease and keep swinging like a sword sheath. (7)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 16
यः स॑मा॒म्यो॒ वरु॑णो॒ यो व्या॒म्यो॒ यः सं॑दे॒श्यो॒ वरु॑णो॒ यो वि॑दे॒श्यः । यो दै॒वो वरु॑णो॒ यश्च॒ मानु॑षः ॥ (८)
वरुण के सामान्य पाश समान रूप से एवं विशेष पाश विधि रूप से मनुष्यों को रोगी बनाते हैं. वरुण का जो पाश समान देश में तथा जो विदेश में बांधने वाला है, जो पाश देवों से संबंधित और जो मनुष्यों से संबंधित है, मैं उन सब पाशों से तुझे बांधता हूं. (८)
The normal loop of Varuna makes humans sick equally and in a special loop method. I bind you to all the loops of Varuna in the same country and which is going to bind abroad, which belongs to the gods and which belongs to human beings. (8)
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