अथर्ववेद (कांड 4)
अ॑पामा॒र्ग ओष॑धीनां॒ सर्वा॑सा॒मेक॒ इद्व॒शी । तेन॑ ते मृज्म॒ आस्थि॑त॒मथ॒ त्वम॑ग॒दश्च॑र ॥ (८)
हे अभिचार के दोष से गृहीत पुरुष! एकमात्र अपामार्ग ही सब जड़ीबूटियों को वश में करने वाला है. हम अपामार्ग की सहायता से तुझ में अभिचार द्वारा उत्पन्न रोग आदि को दूर करते हैं. इस के पश्चात तू रोग रहित हो कर विचरण कर. (८)
O man assumed by the guilt of the act! The only apamarga is going to control all herbs. We remove diseases etc. caused by witchcraft in you with the help of apamarg. After this, you become disease-free and roam around. (8)