अथर्ववेद (कांड 4)
येन॒ ऋष॑यो ब॒लमद्यो॑तयन्यु॒जा येनासु॑राणा॒मयु॑वन्त मा॒याः । येना॒ग्निना॑ प॒णीनिन्द्रो॑ जि॒गाय॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (५)
ऋषियों ने जिन मित्र बने हुए अग्नि की सहायता से अपना सामर्थ्य बढ़ाया, देवों ने जिन की सहायता से असुरों की माया को नष्ट किया तथा जिन अग्नि की सहायता से इंद्र ने पणियों को पराजित किया, वे अग्नि मुझे पाप से बचाए. (५)
The agni with which the sages increased their power with the help of friendly agni, the gods destroyed the maya of the asuras, and the agni with which Indra defeated the panis, saved me from sin. (5)