हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
अ॒ग्नेर्म॑न्वे प्रथ॒मस्य॒ प्रचे॑तसः॒ पाञ्च॑जन्यस्य बहु॒धा यमि॒न्धते॑ । विशो॑विशः प्रविशि॒वांस॑मीमहे॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (१)
मैं मुख्य विशेष ज्ञानी एवं देवयज्ञ, पितृयज्ञ, सूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और बृहत्यज्ञ नामक पांच यज्ञ करने वाले अग्नि देव का महत्त्व जानता हूं. उन्हें अनेक प्रकार से प्रज्वलित किया जाता है. सभी प्रजाओं में जठराग्नि के रूप में प्रवेश करने वाले अग्नि देव से मैं याचना करता हूं कि वह मुझे पाप से बचाएं. (१)
I know the importance of agni dev, the chief special jnani and performing five yajnas namely Devyagya, Pitryagya, Sutayagya, Manavyagya and Brihatyagya. They are ignited in many ways. I beg Agni Dev, who enters all the people in the form of agni, to save me from sin. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
यथा॑ ह॒व्यं वह॑सि जातवेदो॒ यथा॑ य॒ज्ञं क॒ल्पय॑सि प्रजा॒नन् । ए॒वा दे॒वेभ्यः॑ सुम॒तिं न॒ आ व॑ह॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (२)
हे जातवेद अग्नि! तुम जिस प्रकार चरु, पुरोडाश आदि हव्य को देवों तक पहुंचाते हो तथा जिस प्रकार ज्ञान रखते हुए यज्ञ पूर्ण करते हो, उसी प्रकार हमारे विषय में देवों की उत्तम बुद्धि को लाओ. इस प्रकार के अग्नि हमें पाप से छुड़ाएं. (२)
O jataved agni! Just as you convey charu, purodash etc. to the gods and just as you complete the yajna by keeping knowledge, in the same way, bring the good intellect of the gods about us. May this kind of agni redeem us from sin. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
याम॑न्याम॒न्नुप॑युक्तं॒ वहि॑ष्ठं॒ कर्म॑ङ्कर्म॒न्नाभ॑गम॒ग्निमी॑डे । र॑क्षो॒हणं॑ यज्ञ॒वृधं॑ घृ॒ताहु॑तं॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (३)
होम के आधार पर होने के कारण अनेक फल प्राप्त कराने में नियुक्त, ढोने वालों में श्रेष्ठ, अनेक यज्ञ कर्मो के द्वारा सेवनीय, राक्षसों के विनाश कर्ता, यज्ञों की वृद्धि करने वाले एवं घृत की आहुतियों से दीप्त अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. इस प्रकार के अग्ने मुझे पाप से छुड़ाएं. (३)
Being on the basis of home, I praise the agni appointed in getting many fruits, the best among those who carry, the seventable through many yajna karmas, the destroyer of demons, the one who increases the yajnas and the agni lit by the offerings of ghee. May this kind of agni redeem me from sin. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
सुजा॑तं जा॒तवे॑दसम॒ग्निं वै॑श्वान॒रं वि॒भुम् । ह॑व्य॒वाहं॑ हवामहे॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (४)
शोभन जन्म वाले, उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता, संसार के मनुष्यों के हितैषी, व्यापक एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि का मैं आह्वान करता हूं. वह पाप से मेरी रक्षा करें. (४)
I call for the agni that is born, the knower of the creatures born, the benefactor of the human beings of the world, the comprehensive and the one who carries the energy. May he protect me from sin. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
येन॒ ऋष॑यो ब॒लमद्यो॑तयन्यु॒जा येनासु॑राणा॒मयु॑वन्त मा॒याः । येना॒ग्निना॑ प॒णीनिन्द्रो॑ जि॒गाय॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (५)
ऋषियों ने जिन मित्र बने हुए अग्नि की सहायता से अपना सामर्थ्य बढ़ाया, देवों ने जिन की सहायता से असुरों की माया को नष्ट किया तथा जिन अग्नि की सहायता से इंद्र ने पणियों को पराजित किया, वे अग्नि मुझे पाप से बचाए. (५)
The agni with which the sages increased their power with the help of friendly agni, the gods destroyed the maya of the asuras, and the agni with which Indra defeated the panis, saved me from sin. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
येन॑ दे॒वा अ॒मृत॑म॒न्ववि॑न्द॒न्येनौष॑धी॒र्मधु॑मती॒रकृ॑ण्वन् । येन॑ दे॒वाः स्वराभ॑र॒न्त्स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (६)
जिस अग्नि की सहायता से देवों ने अमृत प्राप्त किया, जिन अग्नि की सहायता से जड़ीबूटियों ने मधुर रस प्राप्त किया तथा जिन की सहायता से स्वर्ग प्राप्त किया जाता है, वह अग्ने देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (६)
The agni with the help of which the gods received nectar, with the help of which the herbs got sweet juice and with the help of which heaven is obtained, may the agni god rescue me from sin. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
यस्ये॒दं प्र॒दिशि॒ यद्वि॒रोच॑ते॒ यज्जा॒तं ज॑नित॒व्यं॑ च॒ केव॑लम् । स्तौम्य॒ग्निं ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥ (७)
जिस अग्नि के शासन में सारा जगत्‌ वर्तमान है, अंतरिक्ष में ग्रह, नक्षत्र आदि प्रकाशित हैं, उत्पन्न हुए और उत्पन्न होने वाले सभी प्राणी जिन के शासन में हैं, मैं उन अग्नि की स्तुति करता हूं तथा फल की कामना से बार-बार हवन करता हूं. ऐसे अग्नि देव मुझे पाप से छुड़ाएं. (७)
I praise the agni under whose rule the whole world is present, planets, constellations, etc. are illuminated in space, all the beings born and born under whose rule, I praise that agni and perform havana again and again with the desire for fruit. May such a god of agni rescue me from sin. (7)