हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
म॒रुतां॑ मन्वे॒ अधि॑ मे ब्रुवन्तु॒ प्रेमं वाजं॒ वाज॑साते अवन्तु । आ॒शूनि॑व सु॒यमा॑नह्व ऊ॒तये॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (१)
मैं उनचास मरुतों का माहात्म्य जानता हूं. वे मरुत मुझे अपना कहें. अन्न के लाभ का अवसर आने पर वे इस अन्न की मेरे लिए रक्षा करें. मैं घोड़ों की लगाम के समान संयमित मरुतों को अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से छुड़ाएं. (१)
I know the importance of forty-nine marutas. They call me their own. When the opportunity comes for the benefit of food, they should protect this grain for me. I call upon restrained maruts to protect themselves, just like the reins of horses. May they rescue me from sin. (1)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
उत्स॒मक्षि॑तं॒ व्यच॑न्ति॒ ये सदा॒ य आ॑सि॒ञ्चन्ति॒ रस॒मोष॑धीषु । पु॒रो द॑धे म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातॄं॒स्ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (२)
जो मरुत सदैव वर्षा की धाराओं से युक्त एवं विनाश रहित मेघ को आकाश में फैलाते हैं तथा गेहूं, जौ, वृक्ष आदि में रस सीचते हैं. मध्यमा वाणी जिन की माता हैं, ऐसे मरुतों को मैं अपने सामने रखता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (२)
The deserts always spread the clouds containing rain streams and without destruction in the sky and irrigate the juice in wheat, barley, trees, etc. I keep such maruts in front of me, whose mother is Madhyama Vani. They save me from sin. (2)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
पयो॑ धेनू॒नां रस॒मोष॑धीनां ज॒वमर्व॑तां कवयो॒ य इन्व॑थ । श॒ग्मा भ॑वन्तु म॒रुतो॑ नः स्यो॒नास्ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (३)
हे मरुतो! तुम क्रांतदर्शी हो कर गायों के दूध को, जड़ीबूटियों के रस को तथा घोड़ों के वेग को बढ़ाते हो. सभी कार्य करने में समर्थ वे मरुत्‌ हमारे लिए सुखकारी हों तथा हमें पाप से बचाएं. (३)
O Maruto! You are a revolutionary and increase the milk of cows, the juice of herbs and the velocity of horses. May they be happy for us and save us from sin. (3)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
अ॒पः स॑मु॒द्राद्दिव॒मुद्व॑हन्ति दि॒वस्पृ॑थि॒वीम॒भि ये सृ॒जन्ति॑ । ये अ॒द्भिरीशा॑ना म॒रुत॑श्चरन्ति॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (४)
जो मरुत्‌, सागर के जल को मेघों के द्वारा अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं, इस के पश्चात उसी जल को अंतरिक्ष से धरती पर छोड़ते हैं, उन्हीं जलों के स्वामी बन कर जो मरुत्‌ विचरण करते हैं, वे हमें पाप से छुड़ाएं. (४)
Those who transport the water of the desert, the ocean to space through clouds, after this, they release the same water from space to the earth, those who roam dead by becoming the masters of the same waters, they should free us from sin. (4)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
ये की॒लाले॑न त॒र्पय॑न्ति॒ ये घृ॒तेन॒ ये वा॒ वयो॒ मेद॑सा संसृ॒जन्ति॑ । ये अ॒द्भिरीशा॑ना म॒रुतो॑ व॒र्षय॑न्ति॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (५)
मरुत्‌ वर्षा से उत्पन्न अन्न के द्वारा एवं जलों के द्वारा जनों को तृप्त करते हैं. जो पक्षियों को चरबी से युक्त करते हैं, जो मरुत्‌ मेघों के ईश बन कर विचरण करते हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (५)
People are satisfied by food produced by desert rain and through water. Those who feed the birds with fat, those who roam as gods of the dead clouds, they save us from sin. (5)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
यदीदि॒दं म॑रुतो॒ मारु॑तेन॒ यदि॑ देवा॒ दैव्ये॑ने॒दृगार॑ । यू॒यमी॑शिध्वे वसव॒स्तस्य॒ निष्कृ॑ते॒स्ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (६)
हे मरुतो! यदि मेरा दुःख अथवा दुःख का कारण पाप मुझे मरुत्‌ संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है, हे इंद्र आदि देवो! यदि मुझे यह दुःख देव संबंधी अपराध के कारण प्राप्त हुआ है तो हे मरुतो! इस दुःख अथवा पाप को मिटाने में तुम समर्थ हो. तुम मुझे पाप से छुड़ाओ. (६)
O Maruto! If my sin has been caused by my sorrow or sorrow due to the sin of death, O Indra Adi Devo! If I have received this sorrow because of the guilt of God, then O Maruto! You are capable of eliminating this sorrow or sin. You redeem me from sin. (6)

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
ति॒ग्ममनी॑कं विदि॒तं सह॑स्व॒न्मारु॑तं॒ शर्धः॒ पृत॑नासू॒ग्रम् । स्तौमि॑ म॒रुतो॑ नाथि॒तो जो॑हवीमि॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (७)
तीक्ष्ण समय बना हुआ प्रसिद्ध एवं पराजित करने वाला मरुतों का बल सेनाओं को दुःस्सह होता है. उन्हीं मरुतों की मैं स्तुति करता हूं एवं उन्हें सुख प्राप्ति के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से बचाएं. (७)
The force of the famous and defeating Maruts, which has a sharp time, is the enemy of the armies. I praise the same Maruts and call them for happiness. May they save me from sin. (7)