हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 4.27.1

कांड 4 → सूक्त 27 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 4)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
म॒रुतां॑ मन्वे॒ अधि॑ मे ब्रुवन्तु॒ प्रेमं वाजं॒ वाज॑साते अवन्तु । आ॒शूनि॑व सु॒यमा॑नह्व ऊ॒तये॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥ (१)
मैं उनचास मरुतों का माहात्म्य जानता हूं. वे मरुत मुझे अपना कहें. अन्न के लाभ का अवसर आने पर वे इस अन्न की मेरे लिए रक्षा करें. मैं घोड़ों की लगाम के समान संयमित मरुतों को अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. वे मुझे पाप से छुड़ाएं. (१)
I know the importance of forty-nine marutas. They call me their own. When the opportunity comes for the benefit of food, they should protect this grain for me. I call upon restrained maruts to protect themselves, just like the reins of horses. May they rescue me from sin. (1)