अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हमे॒व स्व॒यमि॒दं व॑दामि॒ जुष्टं॑ दे॒वाना॑मु॒त मानु॑षाणाम् । यं का॒मये॒ तन्त॑मु॒ग्रं कृ॑णोमि॒ तं ब्र॒ह्माणं॒ तमृषिं॒ तं सु॑मे॒धाम् ॥ (३)
मैं ही स्वयं अनुभव किए गए ब्रह्म के विषय में लोकहित की दृष्टि से कह रही हूं. वह ब्रह्म देवों और मनुष्यों का प्रिय है. मैं जिसजिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूं, उसउस को बलवान बना देती हूं. मैं उसे ब्रह्म, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूं. (३)
I am myself saying about the Brahman experienced from the point of view of public interest. He is dear to Brahma Devas and human beings. I make the man I want to protect stronger. I make him Brahman, Rishi and good intellect. (3)