अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिश्चराम्य॒हमा॑दि॒त्यैरु॒त वि॒श्वदे॑वैः । अ॒हं मि॒त्रावरु॑णो॒भा बि॑भर्म्य॒हमि॑न्द्रा॒ग्नी अ॒हम॒श्विनो॒भा ॥ (१)
अंभृण महर्षि की ब्रह्मवादिनी पुत्री वाकू ने स्वयं को ब्रह्म समझ कर स्तुति की है. मैं रुद्रो और वसुओं के साथ संचरण करती हूं. मैं आदित्यों और विश्वे देवों के साथ संचरण करती हूं. मित्र और वरुण को मैं ही धारण करती हूं. इंद्र, अग्नि तथा दोनों अश्चिनीकुमारों को भी मैं ने ही धारण किया है. (१)
Vaku, the daughter of Brahmavadini of Ambhrun Maharshi, has praised herself as Brahma. I communicate with Rudras and Vasus. I communicate with the Adityas and the Gods of the universe. I hold friends and Varun. I have also worn Indra, Agni and both Aschini kumaras. (1)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं राष्ट्री॑ सं॒गम॑नी॒ वसू॑नां चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम् । तां मा॑ दे॒वा व्य॑दधुः पुरु॒त्रा भूरि॑स्थात्रां॒ भूर्या॑वे॒शय॑न्तः ॥ (२)
मैं ही दिखाई देने वाले विश्व का नियंत्रण करने वाली, उपासकों को फल के रूप में धन दिलाने वाली, परब्रह्म का साक्षात्कार करने वाली तथा यज्ञ के योग्य देवों में प्रमुख हूं. अनेक भाग से प्रपंचों में स्थित मुझ को उपासकों को फल देने वाले देव बहुत से साधनों में निर्धारित करते हैं. (२)
I am the one who controls the visible world, who gives wealth to the worshipers as a fruit, who interviews the Supreme Brahman and is the worthy god of yajna. The god who gives fruits to the worshipers determines me, who is located in prapanchas from many parts, in many means. (2)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हमे॒व स्व॒यमि॒दं व॑दामि॒ जुष्टं॑ दे॒वाना॑मु॒त मानु॑षाणाम् । यं का॒मये॒ तन्त॑मु॒ग्रं कृ॑णोमि॒ तं ब्र॒ह्माणं॒ तमृषिं॒ तं सु॑मे॒धाम् ॥ (३)
मैं ही स्वयं अनुभव किए गए ब्रह्म के विषय में लोकहित की दृष्टि से कह रही हूं. वह ब्रह्म देवों और मनुष्यों का प्रिय है. मैं जिसजिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूं, उसउस को बलवान बना देती हूं. मैं उसे ब्रह्म, ऋषि और उत्तम बुद्धि वाला बना देती हूं. (३)
I am myself saying about the Brahman experienced from the point of view of public interest. He is dear to Brahma Devas and human beings. I make the man I want to protect stronger. I make him Brahman, Rishi and good intellect. (3)
अथर्ववेद (कांड 4)
मया॒ सोऽन्न॑मत्ति॒ यो वि॒पश्य॑ति॒ यः प्रा॒णति॒ य ईं॑ शृ॒णोत्यु॒क्तम् । अ॑म॒न्तवो॒ मां त उप॑ क्षियन्ति श्रु॒धि श्रु॑त श्रु॒द्धेयं॑ ते वदामि ॥ (४)
भोग करने वाला जो मनुष्य अन्न खाता है, वह मुझ शक्तिरूपा के द्वारा ही अन्न खाता है. जो मनुष्य विश्व को देखता है, सांस लेता है अथवा सुनता है, ये सब व्यापार शक्ति स्थानों में मैं ही करती हूं. मुझे न मानते हुए वे संसार में क्षीण होते हैं. हे सखा! मेरी कही हुई बात सुन. मैं तुझे श्रद्धा के योग्य ब्रह्म का उपदेश करती हूं. (४)
The person who enjoys food eats food, he eats food only through Me Shaktirupa. The person who sees, breathes or hears the world, I do all this in the places of business power. Not obeying me, they are weak in the world. O friend! Listen to what I said. I preach to you brahman worthy of reverence. (4)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं रु॒द्राय॒ धनु॒रा त॑नोमि ब्रह्म॒द्विषे॒ शर॑वे॒ हन्त॒वा उ॑ । अ॒हं जना॑य स॒मदं॑ कृणोम्य॒हं द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश ॥ (५)
मैं ब्राह्मणों के द्वेषी एवं हिंसकों को मारने के लिए महादेव का धनुष तानती हूं अर्थात् उस की डोरी खींचती हूं. मैं ही स्तोता जन के लिए संग्राम करती हूं तथा द्यावा और पृथ्वी में मैं ही प्रविष्ट हूं. (५)
I point Mahadev's bow to kill the haters and violent people of Brahmins, that is, I pull his string. I am the one who fights for the stomat and I am the one who enters the world and the earth. (5)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं सोम॑माह॒नसं॑ बिभर्म्य॒हं त्वष्टा॑रमु॒त पू॒षणं॒ भग॑म् । अ॒हं द॑धामि॒ द्रवि॑णा ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्या॑ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥ (६)
निचोड़ने योग्य सोमरस को अथवा शत्रुओं का विनाश करने एवं स्वर्ग में स्थित सोम को मैं ही धारण करती हूं. त्वष्टा, पूषा और भव को भी मैं ही धारण करती हूं. हवि लिए हुए, देवों को हवि प्राप्त कराने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान के लिए यज्ञ के फल के रूप में धन मैं ही धारण करती हूं. (६)
I hold the squeezeable somaras or the soma in heaven to destroy enemies and in heaven. I also wear Tvashta, Pusha and Bhava. I hold money as the fruit of yajna for the host who takes havi, who receives havi to the gods and squeezes someras. (6)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हं सु॑वे पि॒तर॑मस्य मू॒र्धन्मम॒ योनि॑र॒प्स्वन्तः स॑मु॒द्रे । ततो॒ वि ति॑ष्ठे॒ भुव॑नानि॒ विश्वो॒तामूं द्यां व॒र्ष्मणोप॑ स्पृशामि ॥ (७)
इस दिखाई देने वाले प्रपंच के ऊपरी भाग अर्थात् सत्यलोक में वर्तमान इस प्रपंच के जनक को मैं जानती हूं. इस जगत् के कारण रूप मेरा उत्पत्ति स्थान सागर के जलों में स्थित हैं. तेज का कारण होने से मैं भुवनों को प्रकाशित करती हूं. मैं इस देह से स्वर्ग का स्पर्श करती हूं. (७)
I know the father of this prapanch present in the upper part of this visible prapancha i.e. Satyalok. Due to this world, my place of origin is located in the waters of the ocean. Being the reason for the fast, I publish bhuvanas. I touch heaven with this body. (7)
अथर्ववेद (कांड 4)
अ॒हमे॒व वात॑इव॒ प्र वा॑म्या॒रभ॑माणा॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । प॒रो दि॒वा प॒र ए॒ना पृ॑थि॒व्यैताव॑ती महि॒म्ना सं ब॑भूव ॥ (८)
सभी भूतों को कारण के रूप में उत्पन्न करती हुई मैं वायु के समान वर्तमान हूं. इस आकाश और इस पृथ्वी से भिन्न रहने वाली मैं अपनी महिमा से इस प्रकार की हुई हूं. (८)
I am as present as air, producing all ghosts as reason. I am separated from this sky and this earth, by my glory. (8)