अथर्ववेद (कांड 4)
अ॑भा॒गः सन्नप॒ परे॑तो अस्मि॒ तव॒ क्रत्वा॑ तवि॒षस्य॑ प्रचेतः । तं त्वा॑ मन्यो अक्र॒तुर्जि॑हीडा॒हं स्वा त॒नूर्ब॑ल॒दावा॑ न॒ एहि॑ ॥ (५)
हे उत्तम ज्ञान वाले मन्यु! तुम्हारे महान यज्ञ में भाग न लेने वाला अर्थात् तुम्हारा यजमान न बनने वाला मैं युद्ध से भाग आया हूं. तुम्हारे संतोष के कर्म न करने वाले मैंने तुम्हें क्रोधित बना दिया. इस समय तुम मेरे बलदाता बन कर आओ. (५)
O manyu of good knowledge! I have fled the war, the one who did not participate in your great sacrifice, that is, who did not become your host. I made you angry for not doing your satisfying deeds. At this time you come as my strongman. (5)