अथर्ववेद (कांड 4)
हृ॒दा पू॒तं मन॑सा जातवेदो॒ विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । स॒प्तास्या॑नि॒ तव॑ जातवेद॒स्तेभ्यो॑ जुहोमि॒ स जु॑षस्व ह॒व्यम् ॥ (१०)
हे जातवेद अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हृदय और मन से पवित्र हवि का हवन करता हूं. हे देव! तुम सभी ज्ञानों को जानते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे सात मुख हैं. उन मुखों के लिए मैं घी का हवन करता हूं. तुम मेरे हव्य को स्वीकार करो. (१०)
O jataved agni! I perform the havan of holy Havi for you with heart and mind. O God! You know all knowledge. O jataved agni! You have seven faces. For those faces, I do a havan of ghee. You accept my desire. (10)