अथर्ववेद (कांड 5)
क॒थं म॒हे असु॑रायाब्रवीरि॒ह क॒थं पि॒त्रे हर॑ये त्वे॒षनृ॑म्णः । पृश्निं॑ वरुण॒ दक्षि॑णां ददा॒वान्पुन॑र्मघ॒ त्वं मन॑साचिकित्सीः ॥ (१)
हे शक्तिशाली वरुण! तुम ने जगत् के पालन करने वाले सूर्य से क्या कहा था? तुम सूर्य को दक्षिणा देते हो एवं मन से चिकित्सा करते हो. (१)
O mighty Varuna! What did you say to the sun that follows the world? You give dakshina to the sun and heal with your mind. (1)