अथर्ववेद (कांड 5)
स॒त्यम॒हं ग॑भी॒रः काव्ये॑न स॒त्यं जा॒तेना॑स्मि जा॒तवे॑दाः । न मे॑ दा॒सो नार्यो॑ महि॒त्वा व्र॒तं मी॑माय॒ यद॒हं ध॑रि॒ष्ये ॥ (३)
यह सत्य बात है कि मैं काव्य अर्थात् अथर्व के द्वारा प्राप्त चतुरता से ज्ञानी बन गया हूं तथा अग्नि के समान सब का मार्गदर्शन करता हूं. मैं जिस व्रत को धारण करूंगा, उसे कोई भंग नहीं कर सकता. (३)
It is true that I have become knowledgeable by the cleverness attained by poetry i.e. Atharva and guide everyone like agni. No one can break the fast I will observe. (3)