अथर्ववेद (कांड 5)
मा मा॑ वोचन्नरा॒धसं॒ जना॑सः॒ पुन॑स्ते॒ पृश्निं॑ जरितर्ददामि । स्तो॒त्रं मे॒ विश्व॒मा या॑हि॒ शची॑भिर॒न्तर्विश्वा॑सु॒ मानु॑षीषु दि॒क्षु ॥ (८)
लोग बारबार तुम्हें धनहीन अथवा कंजूस न समझ लें, इसलिए मैं तुम्हें यह थोड़ा सा धन भेंट करता हूं. मेरी इच्छा है कि तुम्हारी यह स्तुति सारे संसार में फैल जाए और सभी दिशाओं में मनुष्य इसे गाएं. (८)
People do not think of you as moneyless or stingy again and again, so I offer you this little money. I wish that this praise of yours spreads all over the world and humans in all directions sing it. (8)