हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 5.12.1

कांड 5 → सूक्त 12 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
समि॑द्धो अ॒द्य मनु॑षो दुरो॒णे दे॒वो दे॒वान्य॑जसि जातवेदः । आ च॒ वह॑ मित्रमहश्चिकि॒त्वान्त्वं दू॒तः क॒विर॑सि॒ प्रचे॑ताः ॥ (१)
हे उत्पन्न हुओं को जानने वाले अग्नि! तुम आज मनुष्य के यज्ञ में प्रज्वलित हुए हो और देवों का यजन कर रहे हो. लुम मित्रों की पूजा करने वाले एवं ज्ञाता हो. तुम देवों का आह्वान करो. तुम देवों के दूत, ज्ञानवान और क्रांतदर्शी हो. (१)
O agni that knows the creators! You have been ignited in the sacrifice of man today and are worshiping the gods. Lum is the worshiper and knower of friends. You invoke the gods. You are the messengers of the gods, the wise and the visionary. (1)