अथर्ववेद (कांड 5)
आ नो॑ य॒ज्ञं भार॑ती॒ तूय॑मे॒त्विडा॑ मनु॒ष्वदि॒ह चे॒तय॑न्ती । ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स्यो॒नं सर॑स्वतीः॒ स्वप॑सः सदन्ताम् ॥ (८)
सब प्राणियों को जल से संतुष्ट करने वाले अग्नि देव की कांति पृथ्वी का और सरस्वती का आह्वान करने पर सचेत हो. सुंदर कर्म करने वाली ये तीन देवियां कुश पर विराजमान हों. (८)
Be alert when invoking the earth and Saraswati, the radiance of the agni god who satisfies all beings with water. These three goddesses who do beautiful deeds should sit on Kush. (8)