हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
ब्रह्म॑ जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द्वि सी॑म॒तः सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः । स बु॒ध्न्या॑ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठाः स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ वि वः॑ ॥ (१)
संपूर्ण सृष्टि का कारण ब्रह्म सृष्टि के आरंभ में सूर्य के रूप में प्रकट हुआ. उस का तेज सीमा रहित है, जो सभी दिशाओं और लोकों में व्याप्त होता है. वह अनुपम है. सत्‌ इसी से उत्पन्न हुआ है और असत्‌ इसी में समा जाता है. (१)
The cause of the whole creation appeared in the form of the sun at the beginning of Brahman creation. Its sharpness is without limitation, which pervades all directions and worlds. He is unique. Truth is born out of this and asat is absorbed in it. (1)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
अना॑प्ता॒ ये वः॑ प्रथ॒मा यानि॒ कर्मा॑णि चक्रि॒रे । वी॒रान्नो॒ अत्र॒ मा द॑भ॒न्तद्व॑ ए॒तत्पु॒रो द॑धे ॥ (२)
हे मनुष्यो! तुम्हारे विरोधी शत्रुओं ने जो उत्तम कर्म किए हैं, उन कर्मो से वे हमारी संतानों तथा वीरों का विनाश न करें, इसलिए मैं वह अभिचार कर्म तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर रहा हूं. (२)
O men! May your enemies not destroy our children and heroes with the good deeds that they have done, so I am presenting that act to you. (2)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
स॒हस्र॑धार ए॒व ते॒ सम॑स्वरन्दि॒वो नाके॒ मधु॑जिह्वा अस॒श्चतः॑ । तस्य॒ स्पशो॒ न नि॑ मिषन्ति॒ भूर्ण॑यः प॒देप॑दे पा॒शिनः॑ सन्ति॒ सेत॑वे ॥ (३)
आकाश में स्थित एवं हजारों मार्गो वाले स्वर्ग में विनाश करने वाले यह घोषित कर चुके हैं. जो लोग युद्ध में जाने के लिए आनाकानी करते हैं, उन्हें बांधने के लिए यमदूत पाश लिए हुए सदा तत्पर रहते हैं एवं अपनी आंखें कभी बंद नहीं करते. (३)
Those who are located in the sky and with thousands of paths have declared this in heaven. Those who are reluctant to go to war, yamdoots are always ready with a loop to tie them and never close their eyes. (3)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
पर्यु॒ षु प्र ध॑न्वा॒ वाज॑सातये॒ परि॑ वृ॒त्राणि॑ स॒क्षणिः॑ । द्वि॒षस्तदध्य॑र्ण॒वेने॑यसे सनिस्र॒सो नामा॑सि त्रयोद॒शो मास॒ इन्द्र॑स्य गृ॒हः ॥ (४)
हे सूर्य! तुम अन्न उत्पादन के निमित्त मेघों के समीप जाते हो और उन्हें ताड़ित कर के सागर के पास पहुंचाते हो. इसी कारण तुम्हारा नाम सनिस्रत है. वर्ष का तेरहवां महीना जो इंद्र का घर है, तुम उस में भी वर्षा करने को तत्पर हो. (४)
O sun! You go near the clouds for food production and chastise them and bring them to the ocean. That's why your name is Sanasrat. The thirteenth month of the year, which is the house of Indra, you are ready to rain in it too. (4)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
न्वे॒तेना॑रात्सीरसौ॒ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒षेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः ॥ (५)
इसी अभिचार कर्म द्वारा इस पुरुष ने सिद्धि प्राप्त की थी. यह अभिचार कर्म सुंदर आहुति वाला हो. हे सोम और रुद्र! तुम तीखे अस्त्रों वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (५)
This man attained perfection through this abhichar karma. May this act of action be of beautiful sacrifice. O Som and Rudra! You are sharp-armed. May you make us victorious in this war and give us happiness. (5)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
अवै॑तेनारात्सीरसौ॒ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒षेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः ॥ (६)
इस अभिचार कर्म के द्वारा ही इस राजा ने सिद्धि प्राप्त की है एवं शत्रुओं का विनाश किया है. इस की छवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम एवं रुद्र! तुम ती&षण शस्त्रों वाले हो. तुम इस युद्ध में विजय प्रदान करा के हमें सुख दो. (६)
It is through this abhichar karma that this king has attained perfection and destroyed the enemies. Its image is beautiful. O Soma and Rudra! You are armed with weapons. Give us happiness by giving victory in this war. (6)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
अपै॑तेनारात्सीरसौ॒ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒षेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः ॥ (७)
इस अभिचार कर्म द्वारा ही इस राजा ने अपने शत्रुओं का विरोध करते हुए उन का दमन किया तथा सिद्धि प्राप्त की. इस की यह हवि सुंदर आहुति वाली हो. हे सोम और रुद्र! तुम अत्यधिक तीक्ष्ण आयुधों वाले तथा सुख प्राप्त करने वाले हो. तुम हमें इस युद्ध में विजयी बना कर सुख प्रदान करो. (७)
It was through this act of abhichar that this king opposed his enemies and suppressed them and attained perfection. O Som and Rudra! You are very sharp and happy. May you make us victorious in this war and give us happiness. (7)

अथर्ववेद (कांड 5)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
मु॑मु॒क्तम॒स्मान्दु॑रि॒ताद॑व॒द्याज्जु॒षेथां॑ य॒ज्ञम॒मृत॑म॒स्मासु॑ धत्तम् ॥ (८)
हे सोम एवं रुद्र देव! हमें ऐसे पाप से बचाओ, जिस का नाम लेने में भी लज्जा आती है. तुम इस यज्ञ को प्राप्त करो और इस में अमृत धारण करो. (८)
O Soma and Rudra Dev! Save us from such a sin, which is also ashamed to take the name. You receive this yajna and wear nectar in it. (8)
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