अथर्ववेद (कांड 6)
आय॑ने ते प॒राय॑णे॒ दूर्वा॑ रोहन्तु पु॒ष्पिणीः॑ । उत्सो॑ वा॒ तत्र॒ जाय॑तां ह्र॒दो वा॑ पु॒ण्डरी॑कवान् ॥ (१)
हे अग्नि! तुम्हारे अभिमुख जाने में अथवा पराङ्मुख जाने में हमारे देश में पुष्प युक्त कोमल दूर्वा उत्पन्न हो. हमारे घर और खेत में पानी के सोते उत्पन्न हों तथा कमलों वाला सरोवर निर्मित हो. (१)
O agni! In going to your face or in the face of you, a soft fur with flowers should be produced in our country. Water springs should be generated in our house and field and a lake with lotus should be built. (1)