हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.111.1

कांड 6 → सूक्त 111 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
इ॒मं मे॑ अग्ने॒ पुरु॑षं मुमुग्ध्य॒यं यो ब॒द्धः सुय॑तो॒ लाल॑पीति । अतोऽधि॑ ते कृणवद्भाग॒धेयं॑ य॒दानु॑न्मदि॒तोऽस॑ति ॥ (१)
हे अग्नि! मेरे इस पुरुष को रोग के आधार पाप से बचाओ. पाप रूपी पाशों से बंधा हुआ यह पुरुष जो नियमित रूप से प्रलाप करता है, इसीलिए यह तुम्हारे निमित्त हवि रूपी भाग अधिक मात्रा में दे. इस प्रकार यह उन्माद रहित बने. (१)
O agni! Save this man of mine from sin on the basis of disease. This man bound by sin traps who regularly delirium, so give you more of the havi part for you. Thus make it frenzy-free. (1)