हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.115.2

कांड 6 → सूक्त 115 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 115
यदि॒ जाग्र॒द्यदि॒ स्वप॒न्नेन॑ एन॒स्योऽक॑रम् । भू॒तं मा॒ तस्मा॒द्भव्यं॑ च द्रुप॒दादि॑व मुञ्चताम् ॥ (२)
पाप को प्रेम करने वाले हम ने जाग्रत अवस्था में अथवा सोते हुए जो पाप किए, उन से विश्वे देव हमें भूतकाल और भविष्यकाल में काठ के चरण बंधन के समान छुड़ाएं. (२)
May the god of the universe free us from the sins that we have committed in the waking state or while sleeping, like a wooden step bond in the past and the future. (2)