हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
ए॒तं स॑धस्थाः॒ परि॑ वो ददामि॒ यं शे॑व॒धिमा॒वहा॑ज्जा॒तवे॑दाः । अ॑न्वाग॒न्ता यज॑मानः स्व॒स्ति तं स्म॑ जानीत पर॒मे व्योमन् ॥ (१)
हे स्वर्ग में यजमान के साथ बैठने वाले देवो! मैं यह हवि भाग तुम्हें देता हूं. यह विधि रूपी भाग आग्नि तुम सब को प्राप्त कराते हैं. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में जानना. (१)
O Gods who sit with the host in heaven! I give this havi part to you. This method brings you all to agni the part of the method. This host will come following that havi-like method. You know this host in heaven. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
जा॑नी॒त स्मै॑नं पर॒मे व्योम॒न्देवाः॒ सध॑स्था वि॒द लो॒कमत्र॑ । अ॑न्वाग॒न्ता यज॑मानः स्व॒स्तीष्टा॑पू॒र्तं स्म॑ कृणुता॒विर॑स्मै ॥ (२)
हे यजमान के साथ स्वर्ग में बैठने वाले देवो! उस स्वर्ग में इस यजमान को जानना. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में पहचान लेना. (२)
O gods who sit in heaven with the host! To know this host in that heaven. This host will come following that havi-like method. You should recognize this host in heaven. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
देवाः॒ पित॑रः॒ पित॑रो॒ देवाः॑ । यो अस्मि॒ सो अ॑स्मि ॥ (३)
वसु, रुद्र आदि जो देव हैं, वे हमारे पितर हैं. जो पिता, पितामह आदि हमारे पितर हैं, वे ही देव हैं. उन सब का मैं जो हूं, सो हूं. (३)
The gods like Vasu, Rudra etc. are our ancestors. Those who are our fathers, ancestors, etc. are gods. I am who I am of all of them. (3)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
स प॑चामि॒ स द॑दामि । स य॑जे॒ स द॒त्तान्मा यू॑षम् ॥ (४)
उन्हीं देवों और पितरों की संतान मैं पांच यज्ञ करता हूं और दान देता हूं. वही मैं यज्ञ करता हूं. अनुष्ठान के फल के कारण मैं पुत्र, पौत्र आदि से रहित न बनू. (४)
Child of the same gods and ancestors, I perform five Yagya and donate. That's what I do. Due to the fruits of the ritual, I should not be devoid of son, grandson etc. (4)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 123
नाके॑ राज॒न्प्रति॑ तिष्ठ॒ तत्रै॒तत्प्रति॑ तिष्ठतु । वि॒द्धि पू॒र्तस्य॑ नो राज॒न्त्स दे॑व सु॒मना॑ भव ॥ (५)
हे स्वामी सोम! तुम स्वर्गलोक में सुखपूर्वक स्थित रहो, हमारे अनुष्ठान भी स्वर्ग में स्थित रहें. तुम अपने मन में यह निश्चय कर लो कि तुम को मुझे इस अनुष्ठान का फल देना है. हे देव! इस प्रकार के तुम शोभन मन वाले बनो. (५)
O Swami Som! May you be situated happily in heaven, may our rituals also be located in heaven. You decide in your mind that you have to give me the fruit of this ritual. O God! In this way, you become graceful minded. (5)