हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.132.4

कांड 6 → सूक्त 132 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 132
यमि॑न्द्रा॒ग्नी स्म॒रमसि॑ञ्चताम॒प्स्वन्तः शोशु॑चानं स॒हाध्या । तं ते॑ तपामि॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा ॥ (४)
इंद्र और अग्नि देवों ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात्‌ चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (४)
Indra and agni devas immersed Kamadeva in water with his wife Aadhi i.e. anxiety, because he was suffering in his disconnection. O woman! I am for you torment that Cupid with the power of Varuna, the swami of water. (4)