हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.35.3

कांड 6 → सूक्त 35 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 35
वै॑श्वान॒रोऽङ्गि॑रसां॒ स्तोम॑मु॒क्थं च॑ चाक्लृपत् । एषु॑ द्यु॒म्नं स्वर्यमत् ॥ (३)
वैश्वानर अग्नि ने महर्षियों द्वारा किए गए स्तोत्रों और शस्त्रों को समर्थ बनाया है तथा प्रसिद्ध यश एवं अन्न प्राप्त कराया है अथवा इन्हें स्वर्ग प्राप्त कराया है. (३)
Vaishvanar Agni has enabled the stotras and weapons done by the Maharishis and has achieved the famous fame and food or has made them heaven. (3)