हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
अभ॑यं द्यावापृथिवी इ॒हास्तु॒ नोऽभ॑यं॒ सोमः॑ सवि॒ता नः॑ कृणोतु । अभ॑यं नोऽस्तू॒र्वन्तरि॑क्षं सप्तऋषी॒णां च॑ ह॒विषाभ॑यं नो अस्तु ॥ (१)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी कृपा से हम निर्भय हैं. चंद्रमा एवं सूर्य हमें निर्भय करें. द्यावा और पृथ्वी के मध्य में वर्तमान अंतरिक्ष हमारे लिए अभय करे. हमारे द्वारा सप्त ऋषियों को दिया जाता हुआ हवि हमें अभय देने वाला हो. (१)
O earth! By your grace, we are fearless. May the moon and the sun make us fearless. May the present space between Dyawa and Earth be abhaya for us. The havi given by us to the Saptrishis should give us protection. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
अ॒स्मै ग्रामा॑य प्र॒दिश॒श्चत॑स्र॒ ऊर्जं॑ सुभू॒तं स्व॒स्ति स॑वि॒ता नः॑ कृणोतु । अ॑श॒त्र्विन्द्रो॒ अभ॑यं नः कृणोत्व॒न्यत्र॒ राज्ञा॑म॒भि या॑तु म॒न्युः ॥ (२)
सूर्य देव हमारे निवास के गांव में और उस की चारों दिशाओं में अन्न उत्पन्न करें एवं कुशल प्रदान करें. हमारे मित्र इंद्र हमें अभय प्रदान करें तथा राजा का क्रोध हमें त्याग कर हम से दूर चला जाए. (२)
May the Sun God produce food and provide skill in the village of our residence and in its four directions. May our friend Indra give us protection and the king's anger should leave us and go away from us. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 40
अ॑नमि॒त्रं नो॑ अध॒राद॑नमि॒त्रं न॑ उत्त॒रात् । इन्द्रा॑नमि॒त्रं नः॑ प॒श्चाद॑नमि॒त्रं पु॒रस्कृ॑धि ॥ (३)
हे इंद्र! हमारी दक्षिण दिशा को शत्रुरहित करो. हमारी उत्तर दिशा को शत्रुविहीन बनाओ. हमारी पश्चिम और पूर्व दिशाओं को भी शत्रुहीन बनाओ. (३)
O Indra! Make our south direction enemy-free. Make our north direction enemyless. Make our west and east directions enemyless. (3)