हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 6.43.1

कांड 6 → सूक्त 43 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 43
अ॒यं द॒र्भो विम॑न्युकः॒ स्वाय॒ चार॑णाय च । म॒न्योर्वि॑मन्युकस्या॒यं म॑न्यु॒शम॑न उच्यते ॥ (१)
यह दर्भ अर्थात्‌ कुश अपनी जातियों और शत्रुओं के क्रोध के विनाश का कारण है. यह क्रोध करने वाले शत्रु तथा परमार्थ रूप से क्रोधाविष्ट आत्मीय का क्रोध शांत करने का उपाय कहा जाता है. (१)
This darbha i.e. Kush is the cause of the destruction of the anger of its jatis and enemies. It is said to be a way to calm the anger of the angry enemy and the spiritually angry soul. (1)