हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 55
ये पन्था॑नो ब॒हवो॑ देव॒याना॑ अन्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वी सं॒चर॑न्ति । तेषा॒मज्या॑निं यत॒मो वहा॑ति॒ तस्मै॑ मा देवाः॒ परि॑ धत्ते॒ह सर्वे॑ ॥ (१)
जिन मार्गो से केवल देव ही जाते हैं, वे बहुत से मार्ग पृथ्वी और आकाश के मध्य वर्तमान हैं. उन मागों में जो समृद्धि लाने वाला है, मुझे सभी देव उसी मार्ग पर स्थापित करें. (१)
The paths through which only the gods go, many of the paths are present between the earth and the sky. May all gods establish me on the path that is going to bring prosperity in those demands. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 55
ग्री॒ष्मो हे॑म॒न्तः शिशि॑रो वस॒न्तः श॒रद्व॒र्षाः स्वि॒ते नो॑ दधात । आ नो॒ गोषु॒ भज॒ता प्र॒जायां॑ निवा॒त इद्वः॑ शर॒णे स्या॑म ॥ (२)
ग्रीष्म, हेमंत, शिशिर, वसंत, शरद और वर्षा-इन छः ऋतु.ओं के अधिष्ठाता देव हमें सरलता से प्राप्त होने वाले धनों में स्थापित करें. हे ऋतुओं के अभिमानी देवो! तुम हमें गायों एवं पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करो. हम तुम्हारे ऐसे घर में रहें, जहां सभी दुःखों के कारणों का अभाव हो. (२)
May the presiding deity of these six seasons - summer, hemant, shishir, spring, autumn and rain - establish us in the easy-to-get wealth. O proud gods of seasons! You enumerate us with cows and sons, grandsons etc. Let us live in your home where the causes of all sorrows are lacking. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 55
इ॑दावत्स॒राय॑ परिवत्स॒राय॑ संवत्स॒राय॑ कृणुता बृ॒हन्नमः॑ । तेषां॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिया॑ना॒मपि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥ (३)
हे मनुष्यो! इदावत्सर, परिवत्सर और संवत्सर को बारबार नमस्कार कर के प्रसन्न करो. हम यज्ञ के योग्य इदावत्सर आदि के अधिष्ठाता देवों की अनुग्रह बुद्धि में हों तथा उन की कृपा का फल प्राप्त करें. (३)
O men! Please please by greeting Edavatsar, Parivatsar and Samvatsar again and again. We should be in the grace and intellect of the gods who are the presiding deities of Idavatsar etc. worthy of yajna and get the fruits of their grace. (3)