अथर्ववेद (कांड 6)
य॒शसं॒ मेन्द्रो॑ म॒घवा॑न्कृणोतु य॒शसं॒ द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे इ॒मे । य॒शसं॑ मा दे॒वः स॑वि॒ता कृ॑णोतु प्रि॒यो दा॒तुर्दक्षि॑णाया इ॒ह स्या॑म् ॥ (१)
धन के स्वामी इंद्र मुझे यशस्वी बनाएं. ये दोनों धरती और आकाश मुझे यशस्वी बनाएं. सविता देव मुझे यशस्वी बनाएं. मैं यशस्वी बन कर ग्राम, नगर आदि में दक्षिणा देने वाले का प्रिय बनूं. (१)
Indra, the swami of wealth, make me successful. May these two earth and sky make me successful. May Savita Dev make me successful. I should become a success and become the beloved of the one who gives dakshina in village, city etc. (1)