हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 62
वै॑श्वान॒रो र॒श्मिभि॑र्नः पुनातु॒ वातः॑ प्रा॒णेने॑षि॒रो नभो॑भिः । द्यावा॑पृथि॒वी पय॑सा॒ पय॑स्वती ऋ॒ताव॑री यज्ञिये नः पुनीताम् ॥ (१)
सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में वर्तमान अग्नि देव मुझे पवित्र करें. शरीर के मध्य विचरण करते हुए वायु देव मुझे श्वासोच्छ्वास के द्वारा पवित्र करें. वे ही वायु देव अंतरिक्ष में गमन करते हुए मुझे नव प्रदेशों के द्वारा पवित्र करें. जल के सार रस के द्वारा सार वाले, यज्ञ पूर्ण कराने में समर्थ तथा सत्य से पूर्ण द्यावा पृथ्वी मुझे पवित्र करें. (१)
May the present Agni God sanctify me as a gastritis in all beings. While moving in the middle of the body, may vayu dev purify me through breathing. May he, the vayu dev, go to space and sanctify me through the new territories. May the earth, full of essence, capable of completing yajna and full of truth, sanctify me through the essence of water juice. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 62
वै॑श्वान॒रीं सू॒नृता॒मा र॑भध्वं॒ यस्या॒ आशा॑स्त॒न्वो वी॒तपृ॑ष्ठाः । तया॑ गृ॒णन्तः॑ सध॒मादे॑षु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ (२)
हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि से संबंधित तथा प्रिय तत्त्व से पूर्ण स्तुति को आरंभ करो. उस वाणी का शरीर बने हुए ऊपर के भाग विस्तृत हैं. उस वैश्वानर अग्नि की स्तुति करते हुए हम संग्रामो में धन के स्वामी बनें. (२)
O men! Start the full praise related to the Vaishvanar agni and the beloved principle. The upper parts of the body of that speech are wide. While praising that Vaishvanar agni, we become the masters of wealth in the struggles. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 62
वै॑श्वान॒रीं वर्च॑स॒ आ र॑भध्वं शु॒द्धा भव॑न्तः॒ शुच॑यः पाव॒काः । इ॒हेड॑या सध॒मादं॒ मद॑न्तो॒ ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम् ॥ (३)
हे मनुष्यो! तेज पाने के लिए वैश्वानर अग्नि की स्तुति आरंभ करो. हम वैश्वानर अग्नि की कृपा से शुद्ध तथा ब्रह्मवर्चस्व के द्वारा दीप्त हो कर दूसरों को भी पवित्र करें. हम अन्न से पुष्ट हो कर परस्पर प्रसन्नता के हेतु बनें तथा इस लोक में स्थित रह कर उदय होते हुए सूर्य के दर्शन करें. (३)
O men! Start praising the Vaishvanar agni to get faster. Let us be purified by the grace of Vaishvanar Agni and immersed through Brahmavarshva and sanctify others too. We should be strengthened by food and become for mutual happiness and stay in this world and see the rising sun. (3)