हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 76
य ए॑नं परि॒षीद॑न्ति समा॒दध॑ति॒ चक्ष॑से । सं॒प्रेद्धो॑ अ॒ग्निर्जि॒ह्वाभि॒रुदे॑तु॒ हृद॑या॒दधि॑ ॥ (१)
जो राक्षस आदि इस के चारों ओर बैठते हैं तथा हिंसा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं, उन के हृदय से उत्पन्न प्रज्चलित अग्नि उन्हें जला दे. (१)
May the agni produced by the hearts of the demons etc. who sit around it and become ready to commit violence burn them. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 76
अ॒ग्नेः सां॑तप॒नस्या॒हमायु॑षे प॒दमा र॑भे । अ॑द्धा॒तिर्यस्य॒ पश्य॑ति धू॒ममु॒द्यन्त॑मास्य॒तः ॥ (२)
अधिक तपन वाले उन अग्नि देव के जीवन के लिए मैं उपक्रम करता हूं, जिन के मुख से निकलते हुए धूम को अद्धाति नाम के ऋषि देखते हैं. (२)
I undertake for the life of the agni god with more heat, from whose mouth the sage named Adhati sees the smoke. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 76
यो अ॑स्य स॒मिधं॒ वेद॑ क्ष॒त्रिये॑ण स॒माहि॑ताम् । नाभि॑ह्वा॒रे प॒दं नि द॑धाति॒ स मृ॒त्यवे॑ ॥ (३)
विजय के इच्छुक क्षत्रिय जाति के पुरुष के द्वारा स्थापित अग्नि और दीप्त करने वाली आहुतियों को जो पुरुष जानता है, वह मृत्यु का कारण बनने वाले ऐसे स्थान में पैर नहीं रखता है, जहां हाथी, बाघ आदि घूमते हैं. (३)
The man who knows the agni and the lamps set by a man of the Kshatriya jati desirous of victory does not set foot in a place that causes death, where elephants, tigers, etc. roam. (3)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 76
नैनं॑ घ्नन्ति पर्या॒यिणो॒ न स॒न्नाँ अव॑ गछति । अ॒ग्नेर्यः क्ष॒त्रियो॑ वि॒द्वान्नाम॑ गृ॒ह्णात्यायु॑षे ॥ (४)
कल्याण की कामना करने वाले को शत्रु नहीं मार पाते. वह अपने समीपवर्ती शत्रुओं को भी नहीं जानता. जो क्षत्रिय इस प्रकार से महात्मा अग्नि को जानता हुआ, अग्नि का नाम चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उच्चारण करता है, शत्रु उस का वध नहीं कर पाते. (४)
Enemies cannot kill those who wish for welfare. He does not even know his nearest enemies. The Kshatriya who knows Mahatma Agni in this way, chants the name of Agni to live forever, the enemies are not able to kill him. (4)