हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
व॑र॒णो वा॑रयाता अ॒यं दे॒वो वन॒स्पतिः॑ । यक्ष्मो॒ यो अ॒स्मिन्नावि॑ष्ट॒स्तमु॑ दे॒वा अ॑वीवरन् ॥ (१)
यह दिव्य गुण युक्त वरण नाम की वनस्पति से बनी हुई मणि राजयक्ष्मा रोग का निवारण करे. इस पुरुष में जिस यक्ष्मा रोग का निवास है, उस रोग का निवारण इंद्र आदि देव करें. (१)
This gem made from the vegetation named Varan with divine qualities should prevent rajayaksma disease. Indra adi dev should remove the disease of tuberculosis that resides in this man. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
इन्द्र॑स्य॒ वच॑सा व॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य च । दे॒वानां॒ सर्वे॑षां वा॒चा यक्ष्मं॑ ते वारयामहे ॥ (२)
हे रोगी पुरुष! तेरे हाथ में वरण वृक्ष से बनी हुई मणि बांधने वाले हम सब इंद्र, मित्र और वरुण की आज्ञा से यक्ष्मा रोग का निवारण करते हैं. हम सभी देवों की आज्ञा से तेरे यक्ष्मा रोग को तेरे शरीर से निकालते हैं. (२)
O patient man! All of us, who tie a gem made of varan tree in your hand, remove tuberculosis disease by the command of Indra, friend and Varuna. We remove your tuberculosis from your body by the command of all the gods. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 85
यथा॑ वृ॒त्र इ॒मा आप॑स्त॒स्तम्भ॑ वि॒श्वधा॑ य॒तीः।ए॒वा ते॑ अ॒ग्निना॒ यक्ष्मं॑ वैश्वान॒रेण॑ वारये ॥ (३)
त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर जिस प्रकार स्थावर और जंगम विश्व का पोषण करने वाले इन मेघों के जलों की गति रोकता है, हे रोगी! मैं वैश्वानर अग्नि की सहायता से तेरे यक्ष्मा रोग का उसी प्रकार निवारण करता हूं. (३)
Just as Vritrasura, the son of Tvashta, stops the movement of the waters of these clouds that nourish the stable and movable world, O patient! I treat your tuberculosis in the same way with the help of Vaishvanar agni. (3)