अथर्ववेद (कांड 6)
शो॒चया॑मसि ते॒ हार्दिं॑ शो॒चया॑मसि ते॒ मनः॑ । वातं॑ धू॒म इ॑व स॒ध्र्यङ्मामे॒वान्वे॑तु ये॒ मनः॑ ॥ (२)
हे पति और पत्नी! मैं तुम दोनों के हृदयों को परस्पर प्रेम उत्पन्न कर के संतप्त करता हूं. मैं तुम्हारे मन को उसी प्रकार संतप्त करता हूं, जिस प्रकार धुआं वायु का अनुगमन करता है. तुम्हारा मन इसी प्रकार मेरा अनुगामी हो. (२)
O husband and wife! I afflict your hearts by instilling mutual love. I annoy your mind in the same way that smoke follows air. Your mind is like this my follower. (2)