हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
वाञ्छ॑ मे त॒न्वं पादौ॒ वाञ्छा॒क्ष्यौ॒ वाञ्छ॑ स॒क्थ्यौ॑ । अ॒क्ष्यौ॑ वृष॒ण्यन्त्याः॒ केशा॒ मां ते॒ कामे॑न शुष्यन्तु ॥ (१)
हे कामिनी! तू मेरे शरीर, पैरों, नेत्रों और जंघाओं की कामना कर. तू ऐसे पुरुष की कामना करती है, जो तुझे संतुष्ट कर सके. तेरी सुंदर आंखें और केश मेरे मन को व्याकुल करते हैं. (१)
O Kamini! Wish me my body, feet, eyes and thighs. You wish for a man who can satisfy you. Your beautiful eyes and hair disturb my mind. (1)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
मम॒ त्वा दो॑षणि॒श्रिषं॑ कृ॒णोमि॑ हृदय॒श्रिष॑म् । यथा॒ मम॒ क्रता॒वसो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥ (२)
हे पत्नी! मैं तुझे अपनी बांहों और हृदय में आश्रय लेने वाली बनाता हूं. इस प्रकार तू मेरे संकल्प के अधीन होगी और मेरे चित्त को प्राप्त करेगी. (२)
O wife! I make you a refuge in my arms and heart. In this way you will submit to My resolve and receive My mind. (2)

अथर्ववेद (कांड 6)

अथर्ववेद: | सूक्त: 9
यासां॒ नाभि॑रा॒रेह॑णं हृ॒दि सं॒वन॑नं कृ॒तम् । गावो॑ घृ॒तस्य॑ मा॒तरो॒ऽमूं सं वा॑नयन्तु मे ॥ (३)
जिन के अंग आनंद प्राप्ति के साधन होते हैं और जिन के हृदय में विधाता ने वशीकरण की शक्ति प्रदान की है; घी, दूध देने वाली गाएं मेरे ऐसे अधिकार में रहें. (३)
Those whose organs are the means of attaining bliss and in whose heart the creator has given the power of vashikaran; Ghee, milk-giving cows should be in my right. (3)