अथर्ववेद (कांड 7)
सु॒गा वो॑ देवाः॒ सद॑ना अकर्म॒ य आ॑ज॒ग्म सव॑ने मा जुषा॒णाः । वह॑माना॒ भर॑माणाः॒ स्वा वसू॑नि॒ वसुं॑ घ॒र्मं दिव॒मा रो॑ह॒तानु॑ ॥ (४)
हे देवो! तुम्हारे घर सुख से पहुंचने योग्य बनाए गए हैं. हवि का सेवन करने वाले तुम सब घरों में आए थे. तुम अपने धनों को प्राप्त कर के हमारा पोषण करते हुए समस्त लोक में निवास करने वाले आदित्य में स्थित बनो और हमें धन देने के पश्चात अपने स्थान को जाओ. (४)
O God! Your homes have been made accessible happily. All of you who consumed Havi came to the houses. You should get your wealth and nurture us and be located in Aditya, who lives in the whole world and after giving us money, go to your place. (4)