हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 110
अ॑प॒क्राम॒न्पौरु॑षेयाद्वृणा॒नो दैव्यं॒ वचः॑ । प्रणी॑तीर॒भ्याव॑र्तस्व॒ विश्वे॑भिः॒ सखि॑भिः स॒ह ॥ (१)
हे ब्रह्मचारी! तू पुरुषों के हितकारी लौकिक कर्म त्याग कर देव संबंधी वाकय अर्थात्‌ वेद मंत्रों के स्वाध्याय को स्वीकार करता हुआ संयमी बन तथा सभी ब्रह्मचारियों के साथ निवास कर. (१)
Hey celibate! Leaving worldly deeds beneficial to men, accept the words related to God i.e. self-study of Veda mantras, become self-controlled and reside with all brahmacharis. (1)