हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.115.1

कांड 7 → सूक्त 115 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 115
अग्न॒ इन्द्र॑श्च दा॒शुषे॑ ह॒तो वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति । उ॒भा हि वृ॑त्र॒हन्त॑मा ॥ (१)
हे अग्नि और इंद्र! तुम हवि देने वाले यजमान के पापों को पूर्ण रूप से नष्ट करो, क्योंकि तुम दोनों अर्थात्‌ अग्नि और इंदर ने वृत्र का वध किया है. (१)
O Agni and Indra! You completely destroy the sins of the host who gives the havy, for both of you, Agni and Inder, have killed Vritra. (1)