हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 122
आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः । मा त्वा॒ के चि॒द्वि य॑म॒न्विं न पा॒शिनो॑ऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि ॥ (१)
हे इंद्र! स्तुति करने वाले योग्य एवं मोरों के समान रोमों वाले घोड़ों की सहायता से यहां आओ. हे इंद्र! कोई भी स्तोता अपनी स्तुतियों के द्वारा तुम्हें उस प्रकार न रोके, जिस प्रकार पक्षियों को पकड़ने वाला चिड़ीमार पक्षियों को रोकता है. जिस प्रकार प्यासा यात्री जल वाले स्थान पर जाता है, उसी प्रकार दूसरे स्तुतिकर्ताओं का अतिक्रमण कर के तुम शीघ्र हमारे पास आओ. (१)
O Indra! Come here with the help of horses with praiseworthy and peacock-like hairs. O Indra! No hymn stops you with his praises in the same way that the bird catcher stops the birds. Just as a thirsty traveler goes to a place of water, so encroach on other eulogists and come to us soon. (1)