हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.32.1

कांड 7 → सूक्त 32 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
इन्द्रो॒तिभि॑र्बहु॒लाभि॑र्नो अ॒द्य या॑वच्छ्रे॒ष्ठाभि॑र्मघवन्छूर जिन्व । यो नो॒ द्वेष्ट्यध॑रः॒ सस्प॑दीष्ट॒ यमु॑ द्वि॒ष्मस्तमु॑ प्रा॒णो ज॑हातु ॥ (१)
हे इंद्र! आज बहुत सी रक्षाओं अर्थात्‌ रक्षा साधनों के द्वारा हमारा पालन करो. हे धनवान एवं शौर्य संपन्न इंद्र! प्रशंसनीय रक्षा साधनों के द्वारा हमें पूर्णतया प्रसन्न करो. जो शत्रु हम से द्वेष करते हैं, वे अधोमुख हो कर गिरें. जिस श्रु से हम द्वेष करते हैं, उसे तुम्हारा प्राण त्याग दे. (१)
O Indra! Today, follow us through many defenses i.e. defense means. O rich and brave Indra! Please us completely with praiseworthy defense tools. The enemies who hate us should fall face down. Give up your life to the shrew we hate. (1)