हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 41
यस्य॑ व्र॒तं प॒शवो॒ यन्ति॒ सर्वे॒ यस्य॑ व्र॒त उ॑पतिष्ठन्त॒ आपः॑ । यस्य॑ व्र॒ते पु॑ष्ट॒पति॒र्निवि॑ष्ट॒स्तं सर॑स्वन्त॒मव॑से हवामहे ॥ (१)
समस्त पशु अपनी पुष्टि के निमित्त जिस के कर्म का अनुगमन करते हैं, जिस के कर्म में जल आपस में मिलते हैं तथा जिस के कर्म के अधीन पोषण के स्वामी हैं, उन सरस्वान देव की तृप्ति के लिए हम उन का आह्वान करते हैं. (१)
We call upon all the animals to satisfy the Saraswan Dev, whose karma the water meets together for the sake of their confirmation, in whose karma the water meets and under whose karma they are the masters of nourishment. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 41
आ प्र॒त्यञ्चं॑ दा॒शुषे॑ दा॒श्वंसं॒ सर॑स्वन्तं पुष्ट॒पतिं॑ रयि॒ष्ठाम् । रा॒यस्पोषं॑ श्रव॒स्युं वसा॑ना इ॒ह हु॑वेम सद॑नं रयी॒णाम् ॥ (२)
सामने हो कर प्रसन्न करने के लिए हम हवि देने वाले यजमान को मनचाहा फल देने वाले, पोषण के स्वामी, धन के स्थान पर ठहरने वाले एवं धन के पोषक सरस्वान देव को सेवा के निमित्त बुलाते हैं. (२)
In order to please in front of us, we call the host who gives the desired results, the swami of nutrition, the one who stays in place of wealth and the nourisher of wealth, For the sake of service. (2)