हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 44
शि॒वास्त॒ एका॒ अशि॑वास्त॒ एकाः॒ सर्वा॑ बिभर्षि सुमन॒स्यमा॑नः । ति॒स्रो वाचो॒ निहि॑ता अ॒न्तर॒स्मिन्तासा॒मेका॒ वि प॑पा॒तानु॒ घोष॑म् ॥ (१)
हे अकारण निंदित पुरुष! तेरे विषय में कुछ वाणियां स्तुति रूपा एवं कल्याणी हैं तथा कुछ वाणियां तेरे विषय में निंदापूर्ण हैं. सौमनस्य का आचरण करती हुई इन दो प्रकार की वाणियों के अतिरिक्त तीन वाणियां अर्थात्‌ परा, पश्यंती और मध्यमा-इस शब्द प्रयोग में शरीर के भीतर छिपी रहती हैं. केवल एक अर्थात्‌ वैखरी वाणी ध्वनि के रूप में निकलती है. (१)
O man of condemnation for no reason! Some of the statements about you are praise and welfare and some are blasphemous about you. In addition to these two types of words conducting harmony, three words namely Para, Pashyanti and Madhyama - are hidden within the body in this use of words. Only one i.e. Vaikhari speech comes out as sound. (1)