हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.58.8

कांड 7 → सूक्त 58 → मंत्र 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 58
य उ॒भाभ्यां॑ प्र॒हर॑सि॒ पुच्छे॑न चा॒स्येन च । आ॒स्ये॒ न ते॑ वि॒षं किमु॑ ते पुच्छ॒धाव॑सत् ॥ (८)
हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग और मुख में विष नहीं है. तेरे रीओं वाले भाग अर्थात्‌ पूंछ में विष क्यों हो. (८)
O scorpion! You obstruct creatures through both tail and mouth, there is no poison in your middle part and mouth. Why should there be poison in the part of your rheumatic, that is, the tail? (8)