हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 60
इन्द्रा॑वरुणा सुतपावि॒मं सु॒तं सोमं॑ पिबतं॒ मद्यं॑ धृतव्रतौ । यु॒वो रथो॑ अध्व॒रो दे॒ववी॑तये॒ प्रति॒ स्वस॑र॒मुप॑ यातु पी॒तये॑ ॥ (१)
हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के समीप ले जाए. (१)
O Indra and Varuna, who drink the squeezed Someras and fast! Drink the sommers who do the item and the somers we squeezed. May your chariot, which is not defeated by the enemies, take both of you near the host's house to drink someras and perform yajna karma. (1)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 60
इन्द्रा॑वरुणा मधुमत्तमस्य॒ वृष्णः॒ सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम् । इ॒दं वा॒मन्धः॒ परि॑षिक्तमा॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयेथाम् ॥ (२)
हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है, इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२)
O Indra and Varuna who give the desired fruit! Both of you drink the most sweet and desired fruit-giving somers. We have kept this somlakshan food in the characters like Chamas etc., that is why sit on this misrule and drink someras and be satisfied. (2)