हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.61.1

कांड 7 → सूक्त 61 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 61
यद॑ग्ने॒ तप॑सा॒ तप॑ उपत॒प्याम॑हे॒ तपः॑ । प्रि॒याः श्रु॒तस्य॑ भूया॒स्मायु॑ष्मन्तः सुमे॒धसः॑ ॥ (१)
जो शत्रु हम निंदा न करने वालों की निंदा करता है और जो शत्रु हम निंदा करने वालों की निंदा करता है, वह इस प्रकार नष्ट हो जाए जिस प्रकार बिजली से मारा हुआ वृक्ष जड़ से सूख जाता है. (१)
The enemy who condemns those who do not condemn us and the enemy who condemns us who condemn us, should be destroyed in the same way as a tree struck by lightning dries up from the root. (1)