अथर्ववेद (कांड 7)
येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न्येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः । गृ॒हानुप॑ ह्वयामहे॒ ते नो॑ जानन्त्वाय॒तः ॥ (३)
प्रवास करता हुआ पुरुष जिन घरों का स्मरण करता है तथा जिन घरों में सौमनस्य वाला पदार्थ अधिक मात्रा में है, मैं ऐसे घर पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. हमारे ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (३)
I pray to get such houses in the houses where the migrating man remembers and the houses where there is a high amount of harmony. These homes of ours come from migration and know us as masters. (3)