हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 69
पुन॑र्मैत्विन्द्रि॒यं पुन॑रा॒त्मा द्रवि॑णं॒ ब्राह्म॑णं च । पुन॑र॒ग्नयो॒ धिष्ण्या॑ यथास्था॒म क॑ल्पयन्तामि॒हैव ॥ (१)
इंद्र के द्वारा दिया हुआ वीर्य अथवा दी हुई चक्षु आदि इंद्रियों की शक्ति मेरे पास पुनः आए. आत्मा, धन एवं वेद का अध्ययन मुझे पुनः प्राप्त हो. यज्ञ आदि कर्मो में स्थापित अग्नियां इसी स्थान में पुनः प्रवृद्ध हों. (१)
The power of the senses like semen or eyes given by Indra should come to me again. May I regain the study of soul, wealth and Vedas. The agnis installed in yajna etc. should be revived in this place. (1)