अथर्ववेद (कांड 7)
सर॑स्वति व्र॒तेषु॑ ते दि॒व्येषु॑ देवि॒ धाम॑सु । जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि ररास्व नः ॥ (१)
हे सरस्वती देवी! तुम अपने से संबंधित व्रतों में एवं गार्हपत्य यज्ञ आदि रूप दिव्य स्थानों में सामने आ कर हवि स्वीकार करो तथा हमें पुत्र आदि रूप प्रजा प्रदान करो. (१)
O Saraswati Devi! In the fasts related to you and in the form of Garhapatya Yagya etc., come forward in the divine places and accept havi and give us sons etc. (1)