हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 7.97.1

कांड 7 → सूक्त 97 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 7)

अथर्ववेद: | सूक्त: 97
स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मदा॒राच्चि॒द्द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योतु । तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥ (१)
शोभन रक्षा वाले एवं धन के स्वामी इंद्र हम से दूर से ही द्वेष करने वालों को नष्ट करें. हम यज्ञ के योग्य इंद्र की शोभन बुद्धि में हों तथा वह हमारे प्रति सौमनस्य रखें. (१)
May Indra, the protector of shobhan and the swami of wealth, destroy those who hate us from a distance. We should be in the graceful intellect of Indra worthy of yajna and he should be gentle towards us. (1)