अथर्ववेद (कांड 8)
तद्वि॒षं स॒र्पा उप॑ जीवन्त्युपजीव॒नीयो॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (१६)
उस विष के सहारे सर्प जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१६)
Snakes survive with the help of that poison. He who knows this becomes the one who supports everyone with life. (16)