हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
तद्यस्मा॑ ए॒वं वि॒दुषे॒ऽलाबु॑नाभिषि॒ञ्चेत्प्र॒त्याह॑न्यात् ॥ (१)
जो इस को जानने वाले को अलाबु के द्वारा सींचता है, वह उस का हनन कर देता है. (१)
He who waters the one who knows it through Alabu violates him. (1)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
न च॑ प्रत्याह॒न्यान्मन॑सा॒ त्वा प्र॒त्याह॒न्मीति॑ प्र॒त्याह॑न्यात् ॥ (२)
वैसे तो इस का हनन नहीं करता, पर जब मन से सोचता है कि उस का हनन करूं तो हनन कर देता है. (२)
By the way, it does not violate it, but when he thinks with his mind that I should violate it, then he violates it. (2)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
यत्प्र॑त्या॒हन्ति॑ वि॒षमे॒व तत्प्र॒त्याह॑न्ति ॥ (३)
जो विषकारी विनाश करते हैं, वे ही विनाश करवाते हैं. (३)
Those who destroy poison, they cause destruction. (3)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
वि॒षमे॒वास्याप्रि॑यं॒ भ्रातृ॑व्यमनु॒विषि॑च्यते॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (४)
जो इस बात को जानता है, उस का विष ही प्रिय होता है. वह अपने भाई के पुत्र का ही सिंचन करता है. (४)
Whoever knows this, his poison is dear. He irrigates his brother's son. (4)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
सोद॑क्राम॒त्सा ग॑न्धर्वाप्स॒रस॒ आग॑च्छ॒त्तां ग॑न्धर्वाप्स॒रस॒ उपा॑ह्वयन्त॒ पुण्य॑गन्ध॒ एहीति॑ ॥ (५)
उस विराट्‌ ने उत्क्रमण किया और वह गंधर्वो तथा अप्सराओं के समीप पहुंचा. गंधर्वो और अप्सराओं ने उस का आह्वान करते हुए कहा-“हे पुण्य गंध, आओ.” (५)
That virat reversed and he approached the Gandharvas and apsaras. The Gandharvas and the nymphs invoked him and said, "O virtuous smell, come." (5)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
तस्या॑श्चि॒त्रर॑थः सौर्यवर्च॒सो व॒त्स आसी॑त्पुष्करप॒र्णं पात्र॑म् ॥ (६)
सूर्यवर्चस का पुत्र उस का वत्स था और पुष्करपर्ण अर्थात्‌ सरोवर का पत्ता उस का पात्र था. (६)
The son of Suryavarchas was his vatsa and Pushkarparna i.e. the leaf of the lake was his character. (6)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
तां वसु॑रुचिः सौर्यवर्च॒सोधो॒क्तां पुण्य॑मे॒व ग॒न्धम॑धोक् ॥ (७)
सूर्यवर्चस के पुत्र वसुरुचि ने उस का दोहन किया और पुण्यगंध को ही दुहा. (७)
Vasuruchi, the son of Suryavarchas, exploited him and called punyagandha. (7)

अथर्ववेद (कांड 8)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
तं पुण्यं॑ गन्धं ग॑न्धर्वाप्स॒रस॒ उप॑ जीवन्ति॒ पुण्य॑गन्धिरुपजीव॒नीयो॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (८)
गंधर्व और अप्सराएं उस पुण्यगंध को अपने जीवन का सहारा बनाते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन का आश्रय देने वाला बनता है. (८)
Gandharvas and Apsaras make that punyagandha the support of their lives. He who knows this becomes the shelter of life for all. (8)
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